शायद रोज़ किताबों के इश्क़ में कुछ तू मिल जाए (MITHILESH GUPTA)
शायद रोज़ किताबों के इश्क़ में
'' कुछ तू मिल जाए...''
तू न सही , तेरी मुस्कुराहटे ही मिल जाए
तू न सही तेरे ख्वाब ही मिल जाए ,,
हम तुम और लव न सही शायद अब वो कुछ कहानिया ही मिल जाए ,
उड़ते पतंग सी हो गयी है ये ज़िन्दगी ,
कब उड़ जाए उन ऊंचाइयों पर ये भी पता नहीं
और कट जाए डोर इसकी, ये भी पता नहीं ,
तू तो है गुम उस दुनिया में, जहाँ तेरा हर शखस अपना सा होगा।
यहाँ तो अब हम खुद अपने भी न रहे.
दूर दूर तक फैली ये धुप की अन्धकारें ,
ऑंखें खुलूँ या करलूं बंद इसका भी मुझे पता नहीं,
ये होंठ अब भी सूखे से हैं ,
ये आँखें अब भी गीली सी है ,
कमबख्त जाने मेरे हैं या तेरे
इसका भी मुझको पता नहीं .
चुभने लगी है अब तो करवटें भी तेरी याद में ,
दिल तो लगता है आज भी अपना नहीं ,
क्या देखूं अब इस दुनिया में, जब तू ही नज़र आती नहीं।
कुछ तलाश है अब उन कहानियों की जिसमे तेरी रूह मिल जाए।
शायद रोज़ किताबों के इश्क़ में कुछ तू मिल जाए ,
लिख रहा हूँ उन शब्दों को जो दिल का 'ज़ेरोक्स' सी लगती हैं ,
हम तुम और लव न सही शायद अब वो कुछ कहानिया ही मिल जाए ,
वो गुमसुम सी वीरानियाँ ही मिल जाए.
###मिथिलेश गुप्ता Feb/04/2016



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